तू या मैं मूवी रिव्यू: प्यार, ईगो और 15 फीट के मगरमच्छ के बीच फंसी एक सर्वाइवल थ्रिलर

तू या मैं एक सर्वाइवल थ्रिलर है जो 2018 की थाई फिल्म The Pool से प्रेरित मानी जा रही है। इसे डायरेक्ट किया है Bijoy Nambiar ने। लीड रोल में हैं Adarsh Gourav और Shanaya Kapoor
यह फिल्म रोमांटिक ड्रामा का मुखौटा पहनकर शुरू होती है, लेकिन धीरे-धीरे खुद को एक इंटेंस सर्वाइवल टेस्ट में बदल देती है।

कहानी: लव स्टोरी से नाइटमेयर तक

फिल्म की शुरुआत एक सिंपल रोमांटिक सेटअप से होती है।

अवनी शाह एक हाई-प्रोफाइल सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर है। उसकी दुनिया फिल्टर्स, एस्थेटिक्स और ऑनलाइन वैलिडेशन तक सीमित है। दूसरी तरफ है मरुति, नालासोपारा का एक मिडिल क्लास लेकिन टैलेंटेड रैपर। वह ग्राउंडेड है, इमोशनली ऑनेस्ट है और रॉ एनर्जी से भरा हुआ है।

दो अलग-अलग क्लास, दो अलग माइंडसेट, लेकिन अट्रैक्शन असली है।

गोवा रोड ट्रिप के दौरान भारी बारिश, बाइक ब्रेकडाउन और एक रिमोट कोंकण रिसोर्ट तक पहुंचना कहानी को अचानक डार्क मोड में डाल देता है। एक खाली स्विमिंग पूल में एक्सीडेंट और उसी पूल में 15 फीट लंबे मगरमच्छ की एंट्री के बाद फिल्म पूरी तरह प्राइमल सर्वाइवल में शिफ्ट हो जाती है।

यहां टाइटल का असली मतलब समझ आता है। यह लव ट्रायंगल नहीं है। यह सवाल है कि क्राइसिस में कौन बचेगा। तू या मैं।

टोन और ट्रीटमेंट

फिल्म जंप स्केयर पर निर्भर नहीं करती। यह धीरे-धीरे आपको मानसिक रूप से घेरती है। हर कुछ मिनट बाद लगता है कि स्थिति कंट्रोल में आ गई है, लेकिन फिर एक नई समस्या सामने आ जाती है।

  • बढ़ता पानी
  • चोट और थकान
  • गर्मी
  • मानसिक टूटन
  • अकेलापन

यहां असली विलेन सिर्फ मगरमच्छ नहीं है। आइसोलेशन और डेस्पिरेशन ज्यादा खतरनाक साबित होते हैं।

डायरेक्शन और विजुअल अप्रोच

Bijoy Nambiar अपने विजुअल स्टाइल के लिए जाने जाते हैं, लेकिन यहां उन्होंने स्टाइल को कंट्रोल में रखा है।

बारिश, सन्नाटा, अंधेरा और पानी को फिल्म में एक किरदार की तरह इस्तेमाल किया गया है। क्लॉस्ट्रोफोबिया इतना रियल लगता है कि दर्शक खुद सीट पर असहज महसूस करने लगता है।

ज्यादातर फिल्म एक ही लोकेशन में सेट है, फिर भी मोनोटोनी महसूस नहीं होती। यही इसका बड़ा प्लस पॉइंट है।

सिनेमैटोग्राफी

Remy Dalai का काम सराहनीय है।

  • वाइड शॉट्स में कैरेक्टर्स की वल्नरेबिलिटी साफ दिखती है
  • क्लोज अप पैनिक को और रियल बना देते हैं
  • पानी की परछाइयां और डार्क फ्रेम्स टेंशन को विजुअली मजबूत करते हैं

स्विमिंग पूल जैसे सीमित स्पेस को डायनेमिक बनाना आसान नहीं था, लेकिन कैमरा एंगल्स और फ्रेमिंग ने इसे इंटेंस बनाए रखा।

परफॉर्मेंस

आदर्श गौरव

Adarsh Gourav एक बार फिर साबित करते हैं कि वह अपनी पीढ़ी के बेहतरीन एक्टर्स में से हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज, डायलॉग डिलीवरी और इमोशनल वल्नरेबिलिटी बेहद ऑथेंटिक लगती है। वह हीरो नहीं लगते, बल्कि एक आम इंसान लगते हैं जो जान बचाने की कोशिश कर रहा है।

शनाया कपूर

Shanaya Kapoor फिल्म की सबसे बड़ी सरप्राइज हैं। शुरुआत में उनका किरदार सतही लगता है, लेकिन जैसे-जैसे हालात बिगड़ते हैं, उनके कैरेक्टर में गहराई आती है। डर, गिल्ट और असहायता को उन्होंने विश्वसनीय तरीके से निभाया है।

दोनों के बीच का इमोशनल कॉन्फ्लिक्ट फिल्म को सिर्फ सर्वाइवल से आगे ले जाता है।

वीएफएक्स और मगरमच्छ फैक्टर

भारतीय फिल्मों में क्रिएचर वीएफएक्स अक्सर कमजोर रहे हैं। अगर मगरमच्छ नकली लगता, तो पूरी फिल्म का असर खत्म हो जाता।

यहां वीएफएक्स पूरी तरह परफेक्ट नहीं है, लेकिन कंट्रोल्ड और बिलीवेबल है। स्मार्ट कैमरा एंगल्स और लाइटिंग ने क्रोकोडाइल की प्रेजेंस को विश्वसनीय बनाया है। सस्पेंस का बड़ा हिस्सा इसी फैक्टर पर टिका है।

म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर

मरुति के रैप ट्रैक्स कहानी में ऑर्गेनिक लगते हैं। सेकंड हाफ में बैकग्राउंड स्कोर टेंशन को धीरे-धीरे बढ़ाता है। कुछ सीन्स में साउंड डिजाइन ही डर पैदा करता है।

पेसिंग

फर्स्ट हाफ रोमांटिक सेटअप पर फोकस करता है। सेकंड हाफ पूरी तरह सर्वाइवल मोड में चला जाता है।

कुछ जगहों पर पेसिंग स्लो लग सकती है, लेकिन यह जानबूझकर रखा गया इफेक्ट लगता है ताकि थकान और निराशा का एहसास दर्शक तक पहुंचे।

थीम और मैसेज

फिल्म का असली सवाल है:
क्राइसिस में इंसान प्यार चुनेगा या खुद की जान?

यहां लव को हीरोइक तरीके से नहीं दिखाया गया। कभी वह ताकत बनता है, कभी कमजोरी। एक्सट्रीम सिचुएशन में इंसान का असली चेहरा सामने आता है।

कमियां

  • कुछ क्रिएटिव लिबर्टीज रियल वर्ल्ड लॉजिक को स्ट्रेच करती हैं
  • कुछ सीन्स थोड़े ज्यादा सिनेमैटिक लगते हैं
  • वीएफएक्स और बेहतर हो सकता था

फिर भी इमोशनल ऑथेंटिसिटी टेक्निकल कमियों पर भारी पड़ती है।

क्यों देखें?

अगर आप टेंशन ड्रिवन सिनेमा पसंद करते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है।
अगर आप सिर्फ हल्का-फुल्का एस्केपिस्ट एंटरटेनमेंट चाहते हैं, तो यह मूवी थोड़ी भारी लग सकती है।

यह बॉलीवुड की उन दुर्लभ फिल्मों में से है जो सर्वाइवल जॉनर को गंभीरता से लेती हैं। यह सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि एक इंटेंस अनुभव है।

अंतिम शब्द

तू या मैं परफेक्ट नहीं है, लेकिन यह साहसी है।
यह लव स्टोरी को नाइटमेयर में बदल देती है और दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है।

अगर आपने फिल्म देखी है तो आपका अनुभव कैसा रहा? क्या आप ऐसे और सर्वाइवल थ्रिलर्स देखना चाहेंगे?

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